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आचार्य रिव्यु: एक टेंपल टाउन को बचाने आये नक्सली लीडर “आचार्य” की कमजोर और प्रेडिक्टेबल कहानी

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राजन चौहान
राजन चौहानhttps://www.duniyakamood.com/
मेरा नाम राजन चौहान हैं। मैं एक कंटेंट राइटर/एडिटर दुनिया का मूड न्यूज़ पोर्टल के साथ काम कर रहा हूँ। मेरे अनुभव में कुछ समाचार चैनलों, वेब पोर्टलों, विज्ञापन एजेंसियों और अन्य के लिए लेखन शामिल है। मेरी एजुकेशन बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी (सीएसई) हैं। कंटेंट राइटर के अलावा, मुझे फिल्म मेकिंग और फिक्शन लेखन में गहरी दिलचस्पी है।

फिल्म: आचार्य

कास्ट: चिरंजीवी, राम चरण और अन्य

निर्देशक: कोराताला शिव

रन-टाइम: 154 मिनट

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रेटिंग: 2.5/5

क्या आप जानते हैं कि ‘आचार्य’ की पृष्ठभूमि बनाने वाले एक काल्पनिक मंदिर शहर पदाघट्टम में क्या होता है? पदाघट्टम पर दुष्ट मालिक के प्रभुत्व के कारण पदाघट्टम के निवासियों को भयानक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। पदघट्टम के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि यदि कोई पदाघट्टम को नहीं बचाता है तो पदाघट्टम के दिन गिने जाते हैं। अच्छी खबर यह है कि पदाघट्टम एक दिन पदाघट्टम के उद्धारकर्ता के प्रवेश के लिए जागता है। पदाघट्टम का यह नायक पदाघट्टम में धार्मिक व्यवस्था को फिर से स्थापित करने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है ताकि पदाघट्टम के निवासियों फिर से आराम से सांस ले सकें।

क्या है कहानी-

धर्मस्थली नाम का एक काल्पनिक मंदिर शहर पदाघट्टम के ग्रामीणों द्वारा संरक्षित है। वे पूरे शहर को आयुर्वेदिक दवाएं उपलब्ध कराते हैं। बसवा (सोनू सूद) एक नगरपालिका अध्यक्ष है, लेकिन वह धर्मस्थली में अधर्म बनाता है और गैरकानूनी गतिविधियां करता है। एक नक्सली नेता आचार्य (चिरंजीवी) वहां आता है और वहां बढ़ई का जीवन व्यतीत करने लगता है। उन्होंने सिद्धा (राम चरण) से कुछ वादा किया था। वह वादा क्या है, और धर्मस्थली में उसका असली मिशन क्या है? मंदिर शहर किस बुरी ताकत से विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रहा है? ये सब आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा।

एनालिसिस-

मल्टी-स्टारर फिल्मों टिकट खिड़कियों पर कमाल करने में ज्यादातर कामयाब रहती है। हाल ही में राजामौली की “आरआरआर” के लिए एनटीआर और राम चरण की टीम ने दुनिया भर में धूम मचा दी। ‘आचार्य’ एक और तरह की मल्टी-स्टारर है जो मेगास्टार चिरंजीवी और उनके बेटे राम चरण को एक साथ लाती है। आकर्षण यह भी था कि फिल्म कोराताला शिवा द्वारा निर्देशित है, जिन्होंने अपनी चार फिल्मों के साथ 100% सफलता हासिल की है।

पिता-पुत्र की जोड़ी ने ऐसी भूमिकाएँ निभाई हैं जो उनकी विचारधाराओं से अलग हैं। कागज पर विचार सही लग रहा था। लेकिन पर्दे पर ‘आचार्य’ के पास बात करने के लिए कई मुद्दे हैं।

कोराटाला स्टोरी स्टाइल-

कोराटाला की सभी फिल्मों में, नायक एक बाहरी व्यक्ति होता है। ‘मिर्ची’ में प्रभास विदेशी जमीन से गांव में आते हैं, महेश बाबू हैदराबाद से उत्तर आंध्रा के एक गांव में जाते हैं और बाद में उसे गोद ले लेते हैं। वहीं ‘जनता गैरेज’ में एनटीआर मुंबई से हैदराबाद आते हैं। इस बार भी शिवा ने वह पैटर्न दोहराया है। आचार्य में भी बाहर से आते है। नक्सली नेता बने चिरंजीवी, गहरे जंगलों से धर्मस्थली आती है। कोराटाला ने हमें एक ही तकनीक के साथ चार फिल्मों में उलझाने में सफलता हासिल की, लेकिन वह यहां बड़े पैमाने पर लड़खड़ा गए है।

चिरंजीवी के नियमित अच्छे आदमी की भूमिका निभाने वाले दृश्यों में बुरे लोगों की पिटाई करना और चीजों को ठीक करना हम कई बार देख चुके है। शुक्र है कि कोराताला शिवा ने चिरंजीवी और काजल के रोमांटिक पार्ट को काटने का बुद्धिमानी भरा फैसला लिया है।

शुक्र है कि इंटरवल धमाके पर राम चरण का किरदार सामने आने के बाद फिल्म में दिलचस्पी बढ़ जाती है। बाप-बेटे की जोड़ी के बीच के सीन गौर करने लायक हैं। प्रशंसकों के लिए ‘बंजारा’ गाना एक और ट्रीट है जिसका उल्लेख किया जाना चाहिए। हालांकि सेकेंड हाफ में कुछ दिलचस्प पल हैं, लेकिन फिल्म नीरस और बिना सोचे-समझे लिखी गयी है।

तकनीशियनों में सुरेश सेल्वराजन विशेष प्रशंसा के पात्र हैं। उनका प्रोडक्शन डिजाइन फिल्म का मुख्य आकर्षण है। पिता-पुत्र की जोड़ी मेगास्टार चिरंजीवी और राम चरण ‘आचार्य’ से बेहतर पटकथा के हकदार थे। फिल्म पूरी तरह से घिसी-पिटी है।

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