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भूपेंद्र पटेल – गुजरात की राजनीति के नए बादशाह या सिर्फ मोहरे?

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आजकल राजनीतिक उठापटक का दौर है, भारत के चारों कोनों में सभी दलों में सत्ता और शक्ति पाने की होड़ लगी हुई है। पंजाब, राजस्थान, असम, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, गोवा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड यहाँ तक की कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश से भी असंतोष की खबरें थी। लेकिन तीन दिन पहले तूफ़ान आया गुजरात की राजनीति में, जिसको बड़े ही शांति पूर्वक ढंग से संभल लिया गया। मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने इस्तीफा दिया और सत्ता दरबार छोड़ दिया, हालाँकि चर्चाएं तो पहले से थी लेकिन इस वक़्त शायद ही किसी ने सोचा हो।

विजय रुपानी के इस्तीफे की वजह

वैसे तो राजनीति में पावर शिफ्टिंग कोई आसानी से होने नहीं देता लेकिन रुपानी जी की मज़बूरी थी कि इस्तीफा देना पड़ा, सूत्रों कि माने तो कोरोना काल में सरकार के काम काज से आलाकमान नाराज था तो वहीं विपक्ष कि बढ़ती लोकप्रियता को काउंटर कर पाने में भी विजय रुपानी विफल रहे थे। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से ही कांग्रेस के गुजरात में हौसले बुलंद हैं तो वहीं आम आदमी पार्टी भी अपने लिए रास्ता बनाने कि जुगत में है। ऐसे में विजय रुपानी का पब्लिक डोमेन में लोकप्रिय न होना उनके खिलाफ गया।

भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाये जाने के पीछे बड़ी वजह

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यूँ तो गुजरात भाजपा में कई कद्दावर नाम थे जिनमें डिप्टी सी एम नितिन पटेल, पुरुषोत्तम रुपाला, प्रफुल्ल पटेल, मनसुख मंडविया जैसे कई नामों कि चर्चा थी लेकिन मोहर लगी पहली बार के विधायक भूपेंद्र पटेल के नाम पर। साफ़ छवि और भरोसेमंद नेता होने का लाभ पटेल को मिला।

पाटीदार समुदाय से होना और हार्दिक पटेल का गुजरात की राजनीति में उभरना रहे मुख्य कारण

गुजरात में इस अगले साल विधान सभा चुनाव होने हैं ऐसे में पार्टी की एक नजर सत्ता वापसी पर भी है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता के निकट पहुँचने से कांग्रेस में उत्साह है तो भाजपा में बेचैनी। कांग्रेस अध्यक्ष हार्दिक पटेल पाटीदार समुदाय से आते हैं और आगामी विधानसभा में पाटीदार समुदाय जिस करवट बैठेगा सत्ता की चाबी उसी को मिलेगी। पिछले कुछ सालों में हार्दिक पटेल की बढ़ती लोकप्रियता भाजपा के लिए परेशानी का सबब रही है। ऐसे में भाजपा को ऐसे चेहरे की तलाश थी जो पाटीदार समुदाय हो, जिसकी छवि साफ़ हो और जो जनता के बीच अपनी पैठ बना सके। भूपेंद्र पटेल में भाजपा को ये सभी संभावनाएं दिखी इसीलिए उनको कई बड़े नेताओं के ऊपर तरजीह दी गयी।

बड़ी कठिन डगर है पनघट की

भूपेंद्र पटेल के लिए मुख्यमंत्री बनना जितना आसान रहा है उतना ही मुश्किल है उनके लिए उस भरोसे पर खरा उतरना। उनको पार्टी के बहार और भीतर दोनों तरफ चुनौतियों के निपटना है। कहा जा रहा है की भूपेंद्र पटेल के मुख्यमंत्री बनने से गुजरात भाजपा के कई सीनियर नेता रूठ गए हैं, रूठों को मानना और हार्दिक पटेल फैक्टर को कमजोर करने में भूपेंद्र पटेल कितने कामयाब होंगे ये तो समय ही बताएगा लेकिन फ़िलहाल चुनौतियाँ बहुत हैं।

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