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महात्मा गांधी के 5 आंदोलन, जिन्होंने निभाई आजादी में अहम भूमिका।

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अंग्रेजों ने करीब 250 वर्षों तक भारत पर राज किया था। इस दौरान उन्होंने भारत के लोगों को काफी तकलीफ़ दी थी। यूं चो भारत को आजादी दिलान में और भारत के इतिहास के पन्नों में कई लोगों का नाम है। लेकिन गांधीजी का नाम इसमें सबसे ऊपर आता है। गोपाल कृष्ण गोखले के अनुरोध पर 1915 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे। जिसके बाद इन्‍होंने अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसक आंदोलन छेड़ दिया। गांधी जी हिंसा पर विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने भारत को आजादी दिलान के लिए कई आंदोलन किए। यहां जानें ऐसे ही कुछ आंदोलन के बारे में।

चंपारण सत्याग्रह : भारत का पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन, चंपारण आंदोलन बिहार के चंपारण जिले में हुआ था। 1917 में बिहर के चंपारण में हुए इस आंदोलन की शुरूआत गांधी जी ने कीथी। नील की खेती के विरोध में चल रहे नील आंदोलन को ही जब गांधी जी ने बिहार के चम्पारण से शुरू किया तो इसे चम्पारण आंदोलन या चम्पारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाने लगा।

असहयोग आंदोलन : 1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन के तहत लोगों से अपील की गई कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ असहयोग जताने को स्कूल, कॉलेज, न्यायालय न जाएं और न ही कर चुकाएं। इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई जागृति प्रदान की।

नमक सत्याग्रह : महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 में अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से दांडी गांव तक 24 दिनों का पैदल मार्च निकाला था। इसी वजह से इस आंदोलन को दांडी सत्याग्रह भी कहा जाता है।

दलित आंदोलन : उस दौर में दलितों के ऊपर काफी अत्याचार होता था। जिसे छुआछूत कहा जाता था। जिसके बाद 1932 में गांधी जी ने अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना की और देश में फैले छुआछूत के विरोध में महात्मा गांधी ने 8 मई 1933 से छुआछूत विरोधी आंदोलन की शुरुआत की थी। ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन करते हुए हरिजन आंदोलन में मदद के लिए 21 दिन का उपवास किया। यह आंदोलन पूरे देश में इस तरह फैला कि देश में काफी हद तक छुआछूत खत्‍म हो गया है।

भारत छोड़ो आंदोलन : भारत को आजादी 1947 में मिली थी। लेकिन इसकी पहल कई वर्षों से चल रही थी। महत्‍मा गांधी ने अगस्त 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की, इस आंदोलन के कारण भारत छोड़ कर जाने के लिए अंग्रेजों को मजबूर किया गया। 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बंबई सत्र में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया। हालांकि, इसके तुरंत बाद गिरफ्तार हुए पर युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फोड़ के जरिए आंदोलन चलाते रहे। इसके साथ ही एक सामूहिक नागरिक अवज्ञा आंदोलन करो या मरो भी आरंभ किया गया, इस आंदोलन के कारण ही देश के आजादी की नींव पड़ी।

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