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क्या आप जानते हैं खो-खो के बारे में ये बातें ?

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Kho-Kho

भारत में खेलों का बहुत महत्व है। खेल किसी भी व्यक्ति को अनुशासन, टीम-भावना और अन्य महत्वपूर्ण गुणों को सिखाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि खेल दो देशों को या दो लोगों को आपस में जोड़ता है। खेल हमेशा से ही भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहें हैं। कई खेल ऐसे हैं जिनका जन्म भारत में हुआ था। खेल से हमारे शरीर में फुर्ती आती है और हम फिट रहते हैं।

ऐसा ही एक खेल है भारत की गलियों में खेले जाने वाला खो-खो। यह भारत में सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है। इस खेल का नाम सुनते ही बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं। इसमें दो टीम होती हैं। एक टीम मैदान में घुटनों के बल बैठती है। सभी खिलाड़ी एक-दूसरे के विपरीत दिशा में मुंह करके बैठते हैं। जो भी टीम सभी सदस्यों को टैप करके सबसे कम समय में खेल खत्म करती है वही विजयी होती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं इस खेल की शुरुआत कहां से हुई थी ?

वैसे तो इसे हर जगह बड़े चाव से खेला जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत पुणे में हुई थी। प्राचीन काल में इसे रथों पर खेला जाता था और इसे रथेरा कहा जाता था। अब इसे पैदल व्यक्तियों द्वारा खेला जाता है। पहले इस खेल के कोई नियम नहीं थे। 1914 में पहली बार पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब में खो खो के लिए औपचारिक नियम और कानून बनाए गए। कबड्डी और मलखंब जैसे अन्य स्वदेशी भारतीय खेलों के साथ खो खो का प्रदर्शन 1936 के बर्लिन ओलंपिक के दौरान किया गया था। पहली बार अखिल भारतीय खो खो चैंपियनशिप 1959-60 में आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में हुई थी, जबकि महिलाओं के लिए राष्ट्रीय चैंपियनशिप 1960-61 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में खेली गई थी। वर्तमान में लगभग 25 देशों में राष्ट्रीय खो खो टीम है।

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