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जाने कैसे बदल रहा है अफगानिस्तान?

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जब पूरा विश्व अपने अपने देश को एक अलग उचाई पे ले जाने पे लगा हुआ तो वही अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता दोबारा अपना वर्चस्व बढ़ता जा रहा है

अफगानिस्तान में तालिबान कि वापिसी मतलब अफगानिस्तान फिर से 20 साल पहले की तरह बन जायेगा । जहा पर किसी को किसी प्रकार की कोई आज़ादी नही।

महिलाओ से ले कर पुरुष तक कई प्रकार के जंजीरो मे जकड़ दिए जाएंगे और ऐसा फरमान भी दिया जा चुका है तालिबान की तरफ से ।

तालिबान ने चेताया है कि आप सब पहले 20 साल पुराने थे वैसे हो जाये और अगर नही तो इसका अंजाम बुरा होगा।

अफगानिस्तान के सिपेसालर गनी अपने देशवासियों को अंधे कुवें मे अकेला छोड़ कर भाग गए। और साथ साथ कई गाड़ियों मे सारे रुपया पैसा ले कर देश छोड़ दिया।

तालिबानी द्वारा हर प्रकार के प्रतिबंधों का एलान कर दिया गया है की जो कि मानवता के खिलाफ है।

अफगानिस्तान पर पूरी तरह कब्जा करने के बाद तालिबान अब अफगानी सैनिकों को घर-घऱ तलाश रहा है. तालिबान के खौफ से पुलिस और सुरक्षाबलों के जवानों ने वर्दी उतार दी है. वे अपने घर छोड़कर अंडरग्राउंड हो गए हैं. वहीं, तालिबान ने महिलाओं के लिए नीला बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया है.

वही अमेरिकी सिपेसालर जो बाइडेन ने कल अपने देश को संबोधित करते हुए सारा ठीकरा अफगानिस्तान के सिपेसालर गनी पे फोड़ दिया और कहा कि अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का सही समय कभी भी नहीं था. साथ ही उन्होंने कहा है कि वे अपने फैसले के साथ पूरी तरह से खड़े हैं. राजधानी पर काबुल का कब्जा होने के बाद से ही हजारों अफगानों की भीड़ एयरपोर्ट पर जुट गई थी, जिसके बाद अमेरिकी सैनिकों को भीड़ को काबू करने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी थी.

आखिरी बार तालिबान ने पूरे देश पर 1996 से 2001 के बीच शासन किया था. उस दौरान सऊदी अरब, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात ने ही इस शासन को मान्यता दी थी. बीते रविवार को ही राष्ट्रपति अशरफ गनी के इस्तीफे के बाद तालिबान ने अपनी जीत की घोषणा कर दी थी. सरकार गिरने के बाद गनी ने अफगानिस्तान भी छोड़ दिया था. करीब दो दशकों के बाद तालिबान एक बार फिर मजबूत होता नजर आ रहा है. 

अफगानिस्तान में तालिबानी युग की शुरुआत होने के बाद से ही वहां स्थिति भयावह बनी हुई है. आलम ये है कि वहां के रिहायशी इलाकों के रहने वाले हजारों-लाखों लोग अपना सबकुछ छोड़कर देश से निकलना चाहते हैं. इन दर्दनाक हालातों के बीच दिल्ली (Delhi) में रहने वाले अफगानी नागरिकों का उनके अपने मुल्क में रह रहे अपनों से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा. इसके चलते उन्हे अपनों की चिंता सता रही. दिल्ली के अफगान शरणार्थी पल दर पल अपनों का हाल जानने के लिए बेसब्र हैं. वो हर सेकंड ये सोचकर चिंतित है कि वो अपनों को दोबारा देख भी पाएंगे या नहीं.

अफगानिस्तान के शहर मजारे शरीफ की गीता गफूरी 6 साल पहले दिल्ली आई. उस साल कुछ ऐसा खौफनाक हुआ, जिस कारण उन्हें अपना देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी. दरअसल, साल 2015 में मजारे शरीफ में तालिबानी आतंकियों ने बम से हमला कर दिया था, जिसमें उन्होंने अपना घर और परिवार के सदस्य को खो दिया था. मगर भारत आने के बाद भी उनका ये खौफ कम नहीं हुआ. गीता बताती हैं कि वहां काम के लिए घर से निकलते वक्त ये पता नहीं होता था कि शाम तक घर वापस जिंदा लौटेंगे भी या नहीं. बचपन से लेकर साल 2015 तक वो कई बार तालिबानी आतंकी अत्याचारों की चश्मदीद रही हैं.

गीता के मुताबिक, तालिबानी आतंकियों ने लडकियों की जिंदगी नर्क बना दी है. पढ़ने की इजाजत नहीं, विधवा महिलाओं से जबरन शादी, नाबालिग लडकियों को अगवा कर निकाह करते हैं. बच्चों को आतंकी बनाने के लिए किसी भी घर में घुसकर उन्हें अगवा का लेना वहां आम बात है. ऐसे में जब अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे की खबर गीता को मिली तो गीता पूरी तरह से टूट गईं. वहां के हालातों के बारे में सोच-सोचकर गीता रोए जा रही हैं. बीते 3 दिनों से अच्छे से खाया पिया भी नहीं है. उनके मां-बाप जान बचाने के लिए भागकर काबुल पहुंचे हैं. वहां किसी अजनबी के घर उन्होंने रात बिताई. हालांकि गीता अपने मां बाप से पिछले कई दिनों से बात नहीं कर सकी हैं. मगर किसी के जरिए उन्हें जानकारी मिली कि मां-बाप अभी तक सुरक्षित हैं. गीता को अभी भी डर है. उनका कहना है कि तालिबानियों का कोई भरोसा नहीं, कब किसे मार दें. बस हम दुआ कर रहे हैं.

अफगान शरणार्थी आतंक के सरपरस्त मुल्क पाकिस्तान (Pakistan) को भी जमकर कोस रहे हैं. उनके मुताबिक पाकिस्तानियों की वजह से अफगानी मुश्किल में हैं. इसके साथ ही उनका ये भी कहना है कि जो तालिबान की तारीफ करते हैं वो उनसे खौफ खाकर ऐसा करते हैं. दिल्ली के जंगपुरा इलाके में रहने वाले 16 साल के अफगानी रिफ्यूजी मतीन के परिवार के कई लोग अभी भी अफगानिस्तान में फंसे हुए हैं. मतीन का परिवार अपनो के लिए परेशान हैं. मतीन के मुताबिक, तालिबानी अत्याचार से परेशान होकर ही हम यहां आए. वहां लडकियों और महिलाओं की जिंदगी किसी जहन्नुम से कम नहीं है. हम यहां आकर खुश हैं मगर अपने छूटे हुए परिवार की चिंता भी सता रही है

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